काश.....!! कि मेरे पास पंख होते क्योंकि मैं उड़ना चाहती हुं। सच में यार हमेशा से मेरा मन करता था की मतलबी लोगों से भरी इस दुनिया से उड़ कर कही दूर निकल जाऊ, आकाश की ऊँचाइयों को छु लू , बादलों के बीच जाकर देखू आखिर है क्या इनमे ? जो ये उड़ते-फिरते है। मैं भी देखू तो सही आखिर ये हवा आती कहा से है, जिसके बदौलत हम जी रहे हैं। और जिस भगवान के नाम पर हम आपस में लड़ते-मरते रहे है, उसका घर भी तो कहते है कि ऊपर ही कही है। जरा मैं भी तो उस भगवान से मिलु जिन्होनें हमारा निमार्ण किया। हाँ हाँ जानती हूँ मैं की मेरी इस बात पर लोग अपने कई तर्क दे देगें, मगर मुझे किसी का कोई तर्क नहीं सुनना। मुझे तो बस खुद इन्हें महसूस करना है। उड़ना है बहुत दूर तक....! अरे रुकिये....कहीं आप मेरी इस इच्छा को महिलाओं की तरक्की से तो नही जोड़ने लग गए। अगर हां तो में बता दुं कि ऐसा कुछ नही है। क्योंकि कोई कितनी भी तरक्की कर ले, वो रहता तो जमीन पर ही है न। असमान तो छु नहीं पायेगा....तारों के बीच जाकर टिमटिमा तो नही पायेगा।
बस.....काश की कोई मुझे अपने पंख दे देता ताकि मै इन सब एहसासों को भी महसूस कर सकती, इन्हें जी सकती, जिन्दगी का एक सबसे खुबसूरत पल। मुझे लगता है की हर लड़की अपने जीवन में एक बार तो जरुर उड़ना चाहती होगी। आखिर चिडि़याँ और गुडि़याँ दोनों एक जैसी ही तो होती है। मम्मी भी तो कहती है ना की तुम मेरी चिडि़या हो। मगर काश की इस चिडि़या के भी पंख होते। ताकि जब भी इसका दिल करता तो ये फुर-फुर उड़ कर एक पेड़ की डाली से दूसरी पर बैठ जाती। जब मन उदास होता तो एक लम्बी उडान पर निकल जाती। पुरी दुनिया बिना पासपोर्ट, वीजा के घुम सकती तो कितना अच्छा होता ना। ना कोई रोकने वाला और ना ही कोई तोकने वाला। बस हवा के साथ-साथ बहती चली जाती और रात को चाँद जिसे में रोज धरती से देखा करती थी। उसके पास जाती और पूछती क्यों चाँद इतने सुन्दर होते हुए भी तू अकेला सा क्यों दिखता है ? क्या तेरा दिल नहीं करता धरती पे आने का ? मगर में जानती हूँ वह यही कहेगा कि धरती पे आने से अच्छा में गायब ही हो जाऊ.....और सही भी हैं क्योंकि ऐसे लोगों के बीच आने से अच्छा तो गायब होना ही रहेगा ।
काश.....!! कि मै उड़ पाती, तो मेरी मम्मी को भी चिंता ना होती की मेरी बेटियां कहाँ गयी कब आयेगी......मेरे जीवन में मेरे सबसे अच्छे दोस्त होते ये पंछी जिनके साथ मैं दिन भर रहती। अपने सारे सुख-दुःख कहती और उनके सुनती भी। काश....!! की मै उड़ सकती, मेरा मन उड़ना चाहता है। मगर जानती हूँ कोई मुझे पंख नही देगा, कोई उड़ने भी नही देगा। सच यहीं हैं कि इस जीवन में आकर सिर्फ एक बार ही इंसान का उड़ना संभव है और वो तब जब हम इस शरीर को त्याग दे। तब जाके कही रूह शरीर से निकलकर हर असमान को पार करती हुई कही दूर उड़ती चली जाती है। कभी-कभी में ये सोचती हुं कि इंसान होना भी कितनी बड़ी मजबूरी है ना खैर...! चलिए कभी तो मेरा ये सपना पूरा होगा की इंसान होते हुए भी मैं उड़ सकूंगी......बस सही वक्त का इंतजार है क्योंकि कहते है ना की वक्त से पहले और किस्मत से ज्यादा किसी को नही मिलता।

No comments:
Post a Comment