Monday, 13 July 2015

संस्थान से मिली पहचानः शची

दो मासूम से बच्चें...। दोनों कि उम्र भी एक और नाम भी एक। ...पर जहां एक स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहा था, तो वहीं दूसरा पैसे कमाने कि चाह लिए काम पर निकल के लिए। कितनी परेशानी होती है ना ऐसे बच्चों को देखकर जिनसे खेलने-कूदने की उम्र में मेहनत और मजदूरी करवाई जा रही है। ये विडम्बना दिखती तो सबको है, पर अधिकतर देखकर अनदेखा ही कर देते है। हालांकि कुछ ऐसे में से है जो इन बातों को दिल और दिमाग से नही निकाल पाते। उन्ही में से एक है शची सिंह जिनका बच्चों के साथ शुरू से ही गहरा लगाव रहा है। शची के बच्चों से जुडे़ लगाव और उनके दुःखों के एहसास ने एक ऐसे संस्थान को जन्म दिया, जो आज कई बेसहारा बच्चों का सहारा बनकर सामने है। समाजशास्त्र से अपनी पढ़ाई पुरी करने के दौरान ही उनके मन में समाज के वंचित वर्ग के लिए सेवा का इरादा पनपा। अपने इस मजबूत इरादे के दम पर ही उन्होने घरोंदा संस्थान को जन्म दिया। इस संस्थान का मुख्य घ्येय ऐसे बच्चों की जिन्दगी में सुधार लाने का है, जो कई परेशानियों के बावजुद सड़क और रेलवे स्टेशनों पर बदहाल जीवन जीने को मजबूर है। ऐसे दो बच्चों को लेकर घरोंदा शुरू करने वाली शची आज कई बच्चों को एक ठिकाना देने में कामियाब हो चुंकि है। उन्होनें अब तक कई बच्चों को उस दुनिया से बाहर निकाला है, जहां रहने से उनके वर्तमान के साथ-साथ भविष्य भी गहरे अंधकार में था। उनका  मुख्य फोकस ऐसे बच्चों पर रहता है, जो किसी कारणवश अपने घर-परिवार से बिछड़ गये है। इससे पहले कि वो किसी गलत हाथों में जाए, उनका लक्ष्य उन बच्चों को उनके परिवार तक सही-सलामत पहुचांना होता है।

उनके संस्थान ने अब तक करीब 100 से ज्यादा बच्चों को छत दी है। वहां उनकी पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ उन सभी गतिविधियों का पुरा ध्यान रखा जाता है, जो हर एक बच्चें कि पहली जरुरत होती है। जिस सपने को लेकर शची चली थी वो आखिरकार कई सालों बाद उन्हें पुरा होता हुआ नजर आ रहा है। शची जी और उनकी टीम कि कड़ी मेहनत के बाद पुरे देश में चारबाग रेलवे स्टेशन पहला एकमात्र ऐसा स्टेशन बन गया, जहां पर बाल मजदूरी के खिलाफ काम किया जा रहा है, और उन्हें एक नये कल कि तरफ ले जाया जा रहा है। इस काम को उस मुकाम तक पहुंचाने में सबसे बड़ा योगदान अगर किसी का है तो वो इसकी संस्थापक शची सिंह का। उनका मानना है कि जहां चाह होती है, वही राह मिलती है। आज आलम ये है कि उन्हें उनके संस्थान के नाम से ही जाना जाता है। 


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