Tuesday, 23 December 2014
Friday, 12 December 2014
टुंडे का कबाब नहीं खाया तो क्या खाया जनाब ....
नॉनवेज के शौकीन अक्सर कहते सुने
जाते हैं कि अगर टुंडे का कबाब नहीं खाया तो क्या खाया? मुगलई खाने वाले यदि हैदराबादी बिरयानी का गुणगान
करते हैं तो लखनऊ के टुंडे कबाब को भी नहीं भूलते। लखनऊ के अलावा भी कुछ शहरों में
टुंडे के कबाब मिल जाते हैं। जितना प्रसिद्ध ये कबाब है उतनी ही प्रसिद्ध हैं इससे
जुड़ी कहानियां और इसके प्रति दीवानगी के किस्से हैं |
नवाबों की नगरी लखनऊ सिर्फ नजाकत और नफासत
ही नहीं बल्कि अपने लजीज खाने की वजह से भी जानी जाती है। बात जब लजीज खाने की हो और
उसमें टुंडे कबाब का नाम ना लिया जाये तो कुछ बेईमानी सी बात होगी। दुनियाभर में मशहूर
यहां का टुंडे कबाब की खासियत है कि यह मुंह में डालते ही घुल जाता है। इसकी
रेसिपी ही कुछ ऐसी है। राजधानी के चौक में अकबरी गेट के पास एक गली में टुंडे
कबाबी की दुकान आज भी लोगो को अपनी ओर खींचती है। तीसरी पीढ़ी के अबु बकर बताते हैं कि यहां उनके पुरखे करीब 200 साल पहले भोपाल से आए थे। वे बताते हैं कि उनके नाना के वालिद
हाजी मुराद अली भोपाल के नवाब के बावर्ची थे। जो खाने-पीने के बड़े शौकीन थे। ऐसे
में जब उनका बुढ़ापा आया और मुंह में दांत नहीं रहे तो उन्हें गोश्त खाने में
मुश्किल होने लगी। इस पर नवाब साहब ने कुछ नया बनाने की फरमाइश की। इसके बाद
बावर्ची ने मांस को बारीक पीसकर अच्छे-अच्छे मसालों और पपीता डालकर ऐसा कबाब बनाया
गया जो मुंह में रखते ही घुल गया। इसके बाद बूढ़े क्या, जवान नवाबों को भी
गिलावट के कबाब का ऐसा चस्का लगा कि इन्हें अवध के शाही कबाब का दर्जा मिल गया।
साल 1905 में खुली हाजी मुराद अली की दुकान
चौक में अकबरी गेट से थोड़ा अंदर घुसते ही एक बड़ी सी परात में कोयले की धीमी-धीमी आंच में लजीज कबाब पकते नजर आते हैं। ऐसा लगता है कि मानो इसकी सौंधी सी खुशबू आपको खुद अपनी ओर खींच लेती है। साल 1905 में छोटी सी जगह पर खुली हाजी मुराद अली की दुकान देश-दुनिया में किसी पहचान की मोहताज नहीं है। इसे अब टुंडे कबाब के नाम से जाना जाता है। ये बात और है कि ये अपने कबाब बनाने का पुश्तैनी नुस्खा किसी को नहीं बताते हैं। इनकी यही खासियत इन्हें दूसरों से अलग करती है। आज के समय में अमीनाबाद, कपूरथला और सहारागंज में इनकी दुकान चल रही है।
तो इसलिए टुंडे कबाब कहना शुरू कर दिया
टुंडे शब्द का मतलब होता है लूला या जिसका हाथ कटा हो। अबू बकर कहते हैं कि यह नाम तब से मशहूर हुआ जब हाजी मुराद का हाथ पतंग उड़ाते समय टूट गया और उसे बाद में काटना पड़ा। ऐसे में जब मुराद इसी स्थिति में दुकान पर बैठते थे तो लोगों ने इसे टुंडे कबाब बोलना शुरू कर दिया। इसके बाद यह इसी नाम से पूरी दुनिया में मशहूर हो गया।
इसमें कई तरह की जड़ी-बूटियों के साथ 135 तरह के मसालों का इस्तेमाल होता है। सारे मसाले अलग दुकानों से लेते है ताकि पता नहीं चले कि कौन-कौन से मसाले लिए जाते हैं। सभी मसाले घर में ही पीसे और भूने जाते हैं। अबु बकर के मुताबिक, यही उनका ट्रेड सीक्रेट है। इसे आज तक किसी को नहीं बताया गया। इसके अलावा इसमें कच्चा पपीता, भुना बेसन, खुशबू( केवड़ा, लौंग का धुंआ) भी मिलाया जाता है। कबाब बनाने में पूरे दो से ढाई घंटे लगते हैं। इन कबाबों की खासियत को नीम हकीम भी मानते हैं क्योंकि यह पेट के लिए फायदेमंद होता है। इसके साथ पराठे भी खाए जाते है जो मैदा, दूध, बादाम, देसी घी और अंडा डालकर बनाया जाता है।
लखनऊ मैं रहकर अगर आपने अभी तक टुंडे कबाब का लुफ्त नहीं उठाया तो कोई फायेदा नहीं है आपके लखनऊ आने का फिर चाहे आप बाकी कुछ भी खा लो आपको असली मज़ा नही मिलेगा क्यूंकि ...
जब तक टुंडे का कबाब नहीं खाया तो क्या खाया जनाब .....!!
जब तक
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