Friday, 10 November 2017

अनकहे एहसास



मेरे लफ्जों से ज्यादा कीमती हैं मेरे एहसास,काश हर एहसास को लफ्जों में बयां कर पाती मैं...लोग बातें तो बड़ी समझदारी की करते हैं आजकल,पर काश कोई हमें भी समझ पाता...ज़िन्दगी मैं हर शख्स को खुशियाँ बाँटने  की कोशिश करी हैं मैंने अब तक....पर काश कोई मेरे मुस्कान के पीछे छिपे दर्द को भी जान पाता,मेरे लफ्जों से ज्यादा कीमती हैं मेरे एहसास पर काश इस एहसास को कोई समझ पाता..!!
''काश तुम समझ पाते मेरे अनकहे अल्फ़ाज़ों को,
तो ये एहसास स्याही और काग़ज़ के मोहताज ना होते...!
क्या दर्द है मेरे सीने में,न समझ पाया कोई,
क्या वजह है ऐसे जीने में,न समझ पाया कोई..!
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Sunday, 2 July 2017

वक़्त ....
आज  अँधेरा है तो कल सवेरा भी होगा ..
आज मैं  कुछ नही हूँ , तो कल सब मेरा ही होगा ...
आज पतझड़ है , तो कल बहारे भी आयेंगी ...
आज जो आँखें रोती हैं, कल वो मुस्कुरायेंगी ...
आज काटे है तो कल फूल भी खिलेंगे ..
आज जो बिछड़े है कल वो जरुर मिलेंगे 
आज रुसवाईया  हैं तो कल शेहनाईयां  भी होगी 
आज मैं तन्हा हूँ तो कल मेरी भी परछाई होगी ,..
आज गम है तो कल खुशियाँ ही खुशियाँ होगी 
आज जो मुझसे हाथ छुडाते  है कल  वो दामन  पकड़ेंगे 
आज जो मुझसे अनजान है कल वो मेरी एक झलक को तरसेंगे ..
आज जो मेरे पास है , कल भी वो मेरे दिल मैं रहेंगे ..
मेरी चाहत , मेरी मोहब्बत, मेरे हर वक़्त मैं शामिल होंगे ...
वक्त भी ठहरता नही हर लम्हा चलता रहता है ....
पल पल कर के हमेशा यूँ ही गुज़रता रहता है .....!!!
इश्क फिर भी हो ही गया...!!

अजनबी शहर से आये हो तुम 
परदेश की खुशबू लाये हो तुम
ख्वाबों की गलियों से आई हो तुम
बिना दस्तक दिल मैं समाई हो तुम
ख़यालो मैं मेरे तो तुम आते नही 
कहते हैं लोग  की पराये हो तुम 
इश्क फिर भी हो ही गया 
दिल मेरा खो ही गया ...
 मेरे दिल के  मंदिर की मूरत हो तुम 
मेरी पूजा मेरी  इबादत हो तुम
इश्क फिर भी हो ही गया 
दिल मेरा खो ही गया ........

Monday, 17 August 2015

खून चूसू दाई . बाबा

भारत अपनी संस्कृति ,परम्परा एवं सर्व-धर्म-सम्भाव पर चलने वाला देश रहा है । हम विश्व के सभी धर्मो के साथ-साथ अपने बड़े-बुजुर्गो और असहाय लोगो  की सेवा करना अपना कर्तव्य समझते है।  लेकिन हमारी आस्था और श्रद्धा को किस प्रकार ये  तथा कथित बाबा, दाई, मौलवी, पादरी, पाखण्डी धार्मिकता का चोला ओढ़े मूर्ख बना रहे है। इसकी बानगी एक बार फिर राधे माँ के रूप में सामने आई है। जनता को गुमराह करने वाले इन धंधेबाजों ने पूरे देश में लूट मचा रखी है।  ये एकदम वेशधारी चमत्कार और हाईटेक प्रचार करके लोगों को अपने जाल में फांस लेते है और फिर शुरू होता है शोषण का सिलसिला।
दरअसल कारपोरेट फैक्ट्री की तरह यह भी एक व्यापार बन चुका है। कुछ बाबा कथावाचक इसको बड़े मैनेजमेन्ट की टीम के साथ इसका विस्तार करते है। ये तथाकथित बाबा बड़े.बड़े प्रचार तंत्र के बीच भेजते है। यही एजेन्ट ही बाबाओं के लिए भक्त अथवा ग्राहक उपलब्ध कराते है। लम्बे.लम्बे प्रवचन जिसमें त्याग एसमर्पणए निष्ठाए जागृतिए लोभए कामए मोक्ष आदि की बातकर एवं सम्मोहक क्रिया के सहारे उन पर अपना प्रभाव बनाते है। इनके इसी दिखावे के कारण भोले भाले लोग इनके झांसे में आ जाते हैं। फिर इस खेल का विस्तार आगे की टीम को करना होता है। जैसे. भगवान के अवतार में ही बाबाजीए गुरूजीए देवीमाँए आदि का अवतार बनाकर इनके चेले जो विशेष रंगों के वस्त्रों तथा भिन्न मुद्राओं में होते है। वह जनता के दिमाग में इतना भी देते है कि उन्हें ही दुनिया में सिर्फ असली भगवान उनके गुरूजी लगने लगते है। फिर कहा गया है कि ष्ष् तेरा तुझको अर्पणए क्या लागे मेराष्ष् इसी का सहारा लेकर ये बाबा जनता से उनका तन.मन.धन सबकुछ लेकर ऐश करते है। देखने सुनने में लगता है सांई जैसा समर्पण आज तक किसी ने नहीं दिखाया। संत की मूल पहचान उसकी सज्जनता होती थी। भारत भूमि ऐसे संतों से समद्ध रही है। जिनके दर्शनए सानिध्यए और आशीर्वाद हमारे लिए पथ प्रदर्शन करते थे। नीम करोरी बाबाए और पथिक जी महाराज जैसे न जाने कितने संत महात्मा हुए है। जिन्होनें जीवन में त्यागए समर्पणए प्रेम और उदारता की अनगिनत परिभाषाएँ गठित की थी। आज के तथाकथित संतए महात्माए कथावाचक हाईटेक सुविधाओं से लैस करोड़ों के एसी0 आश्रम में न केवल रहते है बल्कि पथ भ्रष्ट और चरित्र भ्रष्ट भी ळै। हरियाणा के रामपाल ने तो शासन.प्रशासन से ट़कराने के लिए पूरी फौज तक बना डाली थी। कई तथाकथित पाखण्डी श्वेत वेष में चिकने चुपड़े होकर भव्य और मंहगे वस्त्र धारण करके प्रवचन देते है। भीरू और भोली जनता उनके प्रभाव में तुरंत ही आ जाती है। आसाराम अज्ञैर नारायण सांई की असलियत तो सबके सामने आ ही गई है। इसी क्रम में आजकल राधे माँ भी चर्चा में है।
            रेड रोज वाली राधे मां
लाखों का मेकअप करके भक्तों के बीच जाने वाली  राधे मां का वैभव किसी फिल्म स्टार से कम नहीं उनके भक्त भी करोड़पति, अरबपति ही होते है। लेकिन समाचार चैनलों में उनके विवादित बोल प्रसारित होते ही उनकी भी असलियत सामने आ गयी। धन की लोलुपता के चलते राधे मां द्वारा नवविवाहित युवती को दहेज के लिए डराना धमकाना और मारना-पीटना भी अब किसी से छिपा नहीं है। पंजाब की रहने वाली राधे मां एक बार फिर विवादों में घिर गई है। हम आपको बताने जा रहे है राधे मां के बारे में वो सब कुछ जो जानना चाहते हैं आप। हमेशा मौन रहने वाली राधे मां के देशभर में लाखों भक्त है। यह अपने भक्तों को आशीर्वाद के रूप में रेड रोज देती है। राधे मां के लिए बड़े शहरों में जागरण का आयोजन किया जाता है। आयोजन में लाखों भक्त पहुंचते है।  जाने- माने गायक  इनकी श्रद्धा में भक्ति गीत गाते है। बड़े-बड़े सेलिब्रिटी का नाम आता है। इनमें पॉप सिंगर दलेर मंेहदी, भोजपुरी गायक हंसराज हंस, ऐड गुरू प्रहलाद कक्कड़ और ऑल इंडिया एंटी टेररिस्ट फं्रट के अध्यक्ष एमएस बिटटा आदि है।
राधे मां का जन्म पंजाब के गुरदासपुर जिले के एक सिख परिवार में हुआ था। इनकी शादी पंजाब के ही रहने वाले व्यापारी सरदार मोहन सिंह से हुई। उन्होनें राधे मां की धार्मिक प्रतिभा को पहचाना। महंत रामदीन के प्रभाव में आने के बाद राधे मां की ख्याति बढ़ी। कथित रूप से  वह लोगों की व्यक्तिगतए व्यापारिक और पारिवारिक समस्याओं को दूर करने लगी। देश में ये क्या हो रहा हैघ् संत महात्माओं का ज्ञान सदैव से समाज को दिशा दिखाता था लेकिन अब वे ऐययाशी और लूटकार की नई इबारत गढ़ रहे है। ऐसा क्यों हैघ्
संत परम्परा भारत के इतिहास से जुड़ी है एवं अनेकों युगों से चली आ रही है। परन्तु क्या आज कल के नौटंकीबाजों को आप  संत मानेंगे। संतक कर्तव्य ही है समाज के लिए अपना निस्वार्थ समर्पण। लेकिन क्या आज के बाबाओं की तुलना उन संतों से करना ठीक होगाघ् जो स्वार्थ और आधुनिक व्यवस्थाओं से लैस है। अपने.अपने परिवार को भगवान के तुल्य बताकर अपनी ही पूजा कराने में लगे है जिनका मकसद सिर्फ धनए वैभव और अपना ही विकास करना है। दूसरों को त्याग और खुद शान.ओ.शौकत से जीवन का अवतार नहीं हो सकते। आखिर हमें और कितना शोषण करवाना पड़ेगाघ् हम ये कब समझेंगे कि ये बाबा वैरागी नहीं जल्लाद है जो अंधविश्वास के सहारे हमारा सब कुछ लिए  जा रहे है। आज देखने तथा सुनने की और बोलने की भी जरूरत आ पड़ी है। हम लोगों को गुमराह करके करोड़ों.अरबों रूपये की दौलत जमा करनेए अपने परिवारों को विदेशों में पढ़ाने तथा ऐश कराने वाले ठग बाबाओं के विरूö एक आन्दोलन खड़ा कानून बनाकर सख्त कार्यवाही के साथ ही इनकी दौलत को देशाहत में लगाने की व्यवस्था को सुनिश्चित करे। ऐसा ना किया गया तो भारत के नाम पर एक ऐसा धब्बा लगायेंगे ये ठग बाबा जो भारतवासियों के लिए सबक  होगा। चोरए डाकूए बलात्कारीए ठग एवं अंग प्रदर्शन में माहिर ये बाबा.दाई हमें यूं ही  गुमराह करते रहेंगे। स्वाधीनता के बाद से ही क्या आम और क्या खास सभी ने सत्ता पर बैठे लोगों को प्रभावित करने का प्रयत्न किया हैं। लेकिन इन प्रयास में वे सफल होने की बजाय बदनाम ही अधिक हुए है।






Saturday, 25 July 2015

उड़ान........




काश.....!! कि मेरे पास पंख होते क्योंकि मैं उड़ना चाहती हुं। सच में यार हमेशा से मेरा मन करता था की मतलबी लोगों से भरी इस दुनिया से उड़ कर कही दूर निकल जाऊ, आकाश की ऊँचाइयों को छु लू , बादलों के बीच जाकर देखू आखिर है क्या इनमे ? जो ये उड़ते-फिरते है। मैं भी देखू तो सही आखिर ये हवा आती कहा से है, जिसके बदौलत हम जी रहे हैं। और जिस भगवान के नाम पर हम आपस में लड़ते-मरते रहे है, उसका घर भी तो कहते है कि ऊपर ही कही है। जरा मैं भी तो उस भगवान से मिलु जिन्होनें हमारा निमार्ण किया। हाँ हाँ जानती हूँ मैं की मेरी इस बात पर लोग अपने कई तर्क दे देगें, मगर मुझे किसी का कोई तर्क नहीं सुनना। मुझे तो बस खुद इन्हें महसूस करना है। उड़ना है बहुत दूर तक....! अरे रुकिये....कहीं आप मेरी इस इच्छा को महिलाओं की तरक्की से तो नही जोड़ने लग गए। अगर हां तो में बता दुं कि ऐसा कुछ नही है। क्योंकि कोई कितनी भी तरक्की कर ले, वो रहता तो जमीन पर ही है न। असमान तो छु नहीं पायेगा....तारों के बीच जाकर टिमटिमा तो नही पायेगा।

बस.....काश की कोई मुझे अपने पंख दे देता ताकि मै इन सब एहसासों को भी महसूस कर सकती, इन्हें जी सकती, जिन्दगी का एक सबसे खुबसूरत पल। मुझे लगता है की हर लड़की अपने जीवन में एक बार तो जरुर उड़ना चाहती होगी। आखिर चिडि़याँ और गुडि़याँ दोनों एक जैसी ही तो होती है। मम्मी भी तो कहती है ना की तुम मेरी चिडि़या हो। मगर काश की इस चिडि़या के भी पंख होते। ताकि जब भी इसका  दिल करता तो ये फुर-फुर उड़ कर एक पेड़ की डाली से दूसरी पर बैठ जाती। जब मन उदास होता तो एक लम्बी उडान पर निकल जाती। पुरी दुनिया बिना पासपोर्ट, वीजा के घुम सकती तो कितना अच्छा होता ना। ना कोई रोकने वाला और ना ही कोई तोकने वाला। बस हवा के साथ-साथ बहती चली जाती और रात को चाँद जिसे में रोज धरती से देखा करती थी। उसके पास जाती और पूछती क्यों चाँद इतने सुन्दर होते हुए भी तू अकेला सा क्यों दिखता है ? क्या तेरा दिल नहीं करता धरती पे आने का ? मगर में जानती हूँ वह यही कहेगा कि धरती पे आने से अच्छा में गायब ही हो जाऊ.....और सही भी हैं क्योंकि ऐसे लोगों के बीच आने से अच्छा तो गायब होना ही रहेगा ।

काश.....!! कि मै उड़ पाती, तो मेरी मम्मी को भी चिंता ना होती की मेरी बेटियां कहाँ गयी कब आयेगी......मेरे जीवन में मेरे सबसे अच्छे दोस्त होते ये पंछी जिनके साथ मैं दिन भर रहती। अपने सारे सुख-दुःख कहती और उनके सुनती भी। काश....!! की मै उड़ सकती, मेरा मन उड़ना चाहता है। मगर जानती हूँ कोई मुझे पंख नही देगा, कोई उड़ने भी नही देगा। सच यहीं हैं कि इस जीवन में आकर सिर्फ एक बार ही इंसान का उड़ना संभव है और वो तब जब हम इस शरीर को त्याग दे। तब जाके कही रूह शरीर से निकलकर हर असमान को पार करती हुई कही दूर उड़ती चली जाती है। कभी-कभी में ये सोचती हुं कि इंसान होना भी कितनी बड़ी मजबूरी है ना खैर...! चलिए कभी तो मेरा ये सपना पूरा होगा की इंसान होते हुए भी मैं उड़ सकूंगी......बस सही वक्त का इंतजार है क्योंकि कहते है ना की वक्त से पहले और किस्मत से ज्यादा किसी को नही मिलता।




Saturday, 18 July 2015

जनसंख्या विस्फोट तरक्की ध्वस्त

क्या आप जानते हैं कि प्रति घंटे संसार भर में कितने बच्चों का जन्म होता है ? क्या आपको जानकारी है कि आपकी अपनी पृथ्वी की आबादी कितनी है? क्या आपको पता है कि यदि भारत ने अपनी जनसंख्या वृद्घि पर रोक लगाई तो 2030 तक हमारा देश दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन जायेगा। आज जनसंख्या विस्फोट का आतंक इस कदर छा चुका है कि 'हम दो हमारे दो' का नारा अब बेमानी सा लगने लगा हैं। सरकार तो जागरुकता फैलाने की कोशिश कर ही रही है लेकिन पता नहीं क्यूं हम जागरुक नहीं हो पा रहे हैं। 
हमारे देश में प्रति मिनट लगभग 25 बच्चों का जन्म होता है। यह आंकड़ा सिर्फ अस्पताल में जन्म लेने वाले बच्चों का ही है इसमें गांवों एवं कस्बों के घरों में जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या नहीं जुड़ी है।
हमारा देश आज भले ही प्रगति कर रहा हो या शिक्षित होने का दावा कर रहा हो लेकिन जमीनी हकीकत इन सबसे कहीं जुदा है। जागरुकता के नाम पर भारत में कई कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं परन्तु वो केवल दीवारों एवं पोस्टरों तक ही सीमित हैं।
चीन को अपनी जनसंख्या के चलते विश्व में प्रथम स्थान प्राप्त है और भारत का विश्व में दूसरा स्थान है। विशेषज्ञों की मानें तो यदि भारत की जनसंख्या वृद्घि इसी गति से होती रही तो 2030 तक जनसंख्या वृद्घि में हम प्रथम स्थान जरूर हासिल कर लेंगे। ध्यान देने योग्य है कि भारत के कई राज्य विकास में भले ही पीछे हो परन्तु उनकी जनसंख्या विश्व के कई देशों की जनसंख्या से अधिक है। अपनी इस उपलब्धि के साथ हम यह कह सकते है कि भारत में जनसँख्या के आधार पर विश्व के कई देश बसते है।
भारत में स्वास्थ्य-सेवायें भी भगवान भरोसे ही हैं। एक तरफ  जहां हमारी सरकार चिकित्सा-पर्यटन को बढ़ावा देने की बात करती है, तो वहीं देश का दूसरा पक्ष कुछ और ही बयान करता है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में शहरों की अपेक्षा मृत्यु दर ज्यादा है। एक आकड़े के मुताबिक आजादी के इतने वर्षों के बाद भी इलाज के आभाव में प्रसव काल में 1000 मे 110 महिलाएं दम तोड़ देती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो प्रसव के समय दम तोडऩे वाली महिलाओ में 99 प्रतिशत महिलाये विकाशसील देशों से सम्बंधित रखती है। जबकि प्राय: उन्हें बचाया जा सकता है। इतना ही नहीं जनसंख्या वृद्धि को रोकने हेतु भारत सरकार की नियत भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि सरकार ने आशा और आंगनबाडी की कर्मचारियों पर जो आज भी 1000-1500 रुपये मासिक वेतन के लिए भटकते हैं, उन्ही पर परिवार कल्याण योजनाओं की जिम्मेदारी सौपी है।
जन्म दर को कम करके जनसंख्या वृद्धि में कटौती करने को ही आम तौर पर जनसंख्या नियंत्रण माना जाता है। परन्तु प्रश्न यह है कि इस देश की इतनी बड़ी जनसंख्या वृद्धि की समस्या की जिम्मेदारी किस पर छोड़ी जाये। इस पर सरकार के पास कोई ठोस नीति नहीं है, एवं उनमें जनसंख्या रोकने की दृढ़ इच्छाशक्ति भी दिखती।
संसद में देशहित को ध्यान में रखते हुए इस समस्या को लेकर बहस होनी चाहिए लेकिन सब मौन है। हमारी सरकार पांच सितारा होटलों में एक दूसरे की पीठ थपथपा कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहती है। जबकि जनसंख्या विस्फोट की चर्चा ग्रामीण एवं अशिक्षित समाज के बीच होनी चाहिए। इतना ही नहीं नौकरशाहों के सुझावों पर सरकार को गंभीरता से सोचना चाहिए। यदि हर मिनट इतने बच्चे पैदा हो रहे हैं तो जरा सोचिये, हर दिन कितने बच्चे पैदा होते होंगे। हम जनसंख्या तो बढ़ा रहे हैं लेकिन संसाधनों को इस तरह खत्म कर रहे हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए संसाधनों के खत्म होने का डर लगातार बढ़ता ही जा रहा है। यह कहना गलत होगा कि वह दिन दूर नहीं जब हम दाने-दाने के लिये मोहताज हो जायेंगे।
जनसंख्या में लगातार वृद्धि होने में लोगों की अज्ञानता सबसे बड़ा कारण रही। क्योंकि एक तो इस क्षेत्र में नियंत्रण के साधन निकट या सुलभ नहीं थे। और दूसरा लोगों में जन्म लेने वाले बच्चे के प्रति यह भाव भी रहता था कि जितने लडक़े-बच्चे होंगे, परिवार में उतनी आय बढ़ेगी। कृषि प्रधान भारत के समाज में बहू को 'दूधो नहाओ, पूतो फलो' का आशीर्वाद प्रदान किया जाता है। जिससे अब स्थिति ये हो गई है कि सामान्य आदमी के पास तो इतना दूध है कि पूत को पिलाया जा सके औरदूध से नहलाने का तो कोई सोच भी कैसे सकता है। पढ़ी-लिखी लड़कियां विवाह के उपरांत अमूमन दो ही बच्चों तक अपना परिवार सीमित रखना चाहती हैं। लेकिन जो पढ़ी-लिखी नहीं होती है। उनके यहां अब भी बच्चों की संख्या पांच-सात तक पहुंच जाती है। अब जनसंख्या विस्फोट इतना जबर्दस्त है कि अधिक अनाज के उत्पादन के लिए रसायनिक पदार्थों का प्रयोग बेरोक-टोक फल-फूल रहा है। एक रसायनिक इंजेक्शन से 1 किलो की लौकी को 2 किलो का बनाने के बाद भी इंसानों का पेट नहीं भर पा रहा है।
सत्य तो ये है कि जनसंख्या नियंत्रण के मामले में हमारी स्थिती संतोषजनक नहीं है। अब चाहें विश्व में भारत पहला ऐसा देश भले ही हो जिसने 1952 में राष्ट्रीय परिवार कल्याण नियंत्रण कार्यक्रम की शुरूआत की थी। लेकिन हमारे लिए समस्या जस की तस है। जनसंख्या और परिवार नियोजन को समझना एक बडी चुनौती है। इस पर हम सभी को चिन्तन करना चाहिए। पर्यावरण पर बढ़ते आबादी के बोझ के कारण प्राकृतिक आपदाएं और समस्याएं दिनों-दिन बढ़ रही है। कहीं मौसम खराब तो कही खाने की कमी, कहीं ज्यादा बारिश, तो कहीं सूखा। नकली सामान बनाने और कालाबाजारी करने के बाद भी सभी के जरुरतों को हम पूरा नहीं कर पा रहे हैं।

कहा जाए तो इस कलियुग में हम सभी विकास की जेट पर सवार हैं। इस प्रतिकूल स्थिति में भी जनसंख्या पर नियंत्रण इंसान बिना किसी दबाव के कर सकता है। लेकिन इसके लिए उसका जागरुक और शिक्षित होना जरुरी है। लिहाजा सरकार का कर्तव्य है कि वह जनता की आधारभूत जरुरतों को पूरा करने में उसकी मदद करे। ऐसा करने से हो सकता है कि जनसंख्या वृद्घि में कमी आये।

Monday, 13 July 2015

संस्थान से मिली पहचानः शची

दो मासूम से बच्चें...। दोनों कि उम्र भी एक और नाम भी एक। ...पर जहां एक स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहा था, तो वहीं दूसरा पैसे कमाने कि चाह लिए काम पर निकल के लिए। कितनी परेशानी होती है ना ऐसे बच्चों को देखकर जिनसे खेलने-कूदने की उम्र में मेहनत और मजदूरी करवाई जा रही है। ये विडम्बना दिखती तो सबको है, पर अधिकतर देखकर अनदेखा ही कर देते है। हालांकि कुछ ऐसे में से है जो इन बातों को दिल और दिमाग से नही निकाल पाते। उन्ही में से एक है शची सिंह जिनका बच्चों के साथ शुरू से ही गहरा लगाव रहा है। शची के बच्चों से जुडे़ लगाव और उनके दुःखों के एहसास ने एक ऐसे संस्थान को जन्म दिया, जो आज कई बेसहारा बच्चों का सहारा बनकर सामने है। समाजशास्त्र से अपनी पढ़ाई पुरी करने के दौरान ही उनके मन में समाज के वंचित वर्ग के लिए सेवा का इरादा पनपा। अपने इस मजबूत इरादे के दम पर ही उन्होने घरोंदा संस्थान को जन्म दिया। इस संस्थान का मुख्य घ्येय ऐसे बच्चों की जिन्दगी में सुधार लाने का है, जो कई परेशानियों के बावजुद सड़क और रेलवे स्टेशनों पर बदहाल जीवन जीने को मजबूर है। ऐसे दो बच्चों को लेकर घरोंदा शुरू करने वाली शची आज कई बच्चों को एक ठिकाना देने में कामियाब हो चुंकि है। उन्होनें अब तक कई बच्चों को उस दुनिया से बाहर निकाला है, जहां रहने से उनके वर्तमान के साथ-साथ भविष्य भी गहरे अंधकार में था। उनका  मुख्य फोकस ऐसे बच्चों पर रहता है, जो किसी कारणवश अपने घर-परिवार से बिछड़ गये है। इससे पहले कि वो किसी गलत हाथों में जाए, उनका लक्ष्य उन बच्चों को उनके परिवार तक सही-सलामत पहुचांना होता है।

उनके संस्थान ने अब तक करीब 100 से ज्यादा बच्चों को छत दी है। वहां उनकी पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ उन सभी गतिविधियों का पुरा ध्यान रखा जाता है, जो हर एक बच्चें कि पहली जरुरत होती है। जिस सपने को लेकर शची चली थी वो आखिरकार कई सालों बाद उन्हें पुरा होता हुआ नजर आ रहा है। शची जी और उनकी टीम कि कड़ी मेहनत के बाद पुरे देश में चारबाग रेलवे स्टेशन पहला एकमात्र ऐसा स्टेशन बन गया, जहां पर बाल मजदूरी के खिलाफ काम किया जा रहा है, और उन्हें एक नये कल कि तरफ ले जाया जा रहा है। इस काम को उस मुकाम तक पहुंचाने में सबसे बड़ा योगदान अगर किसी का है तो वो इसकी संस्थापक शची सिंह का। उनका मानना है कि जहां चाह होती है, वही राह मिलती है। आज आलम ये है कि उन्हें उनके संस्थान के नाम से ही जाना जाता है।