क्या आप जानते
हैं कि प्रति
घंटे संसार भर
में कितने बच्चों
का जन्म होता
है ? क्या आपको
जानकारी है कि
आपकी अपनी पृथ्वी
की आबादी कितनी
है? क्या आपको
पता है कि
यदि भारत ने
अपनी जनसंख्या वृद्घि
पर रोक न
लगाई तो 2030 तक
हमारा देश दुनिया
की सबसे बड़ी
आबादी वाला देश
बन जायेगा। आज
जनसंख्या विस्फोट का आतंक
इस कदर छा
चुका है कि
'हम दो हमारे
दो' का नारा
अब बेमानी सा
लगने लगा हैं।
सरकार तो जागरुकता
फैलाने की कोशिश
कर ही रही
है लेकिन पता
नहीं क्यूं हम
जागरुक नहीं हो
पा रहे हैं।
हमारे देश में
प्रति मिनट लगभग
25 बच्चों का जन्म
होता है। यह
आंकड़ा सिर्फ अस्पताल में
जन्म लेने वाले
बच्चों का ही
है इसमें गांवों
एवं कस्बों के
घरों में जन्म
लेने वाले बच्चों
की संख्या नहीं
जुड़ी है।
हमारा देश आज
भले ही प्रगति
कर रहा हो
या शिक्षित होने
का दावा कर
रहा हो लेकिन
जमीनी हकीकत इन
सबसे कहीं जुदा
है। जागरुकता के
नाम पर भारत
में कई कार्यक्रम
चलाये जा रहे
हैं परन्तु वो
केवल दीवारों एवं
पोस्टरों तक ही
सीमित हैं।
चीन को अपनी
जनसंख्या के चलते
विश्व में प्रथम
स्थान प्राप्त है
और भारत का
विश्व में दूसरा
स्थान है। विशेषज्ञों
की मानें तो
यदि भारत की
जनसंख्या वृद्घि इसी गति
से होती रही
तो 2030 तक जनसंख्या
वृद्घि में हम
प्रथम स्थान जरूर
हासिल कर लेंगे।
ध्यान देने योग्य
है कि भारत
के कई राज्य
विकास में भले
ही पीछे हो
परन्तु उनकी जनसंख्या
विश्व के कई
देशों की जनसंख्या
से अधिक है।
अपनी इस उपलब्धि
के साथ हम
यह कह सकते
है कि भारत
में जनसँख्या के
आधार पर विश्व
के कई देश
बसते है।
भारत में स्वास्थ्य-सेवायें भी भगवान
भरोसे ही हैं।
एक तरफ जहां हमारी
सरकार चिकित्सा-पर्यटन
को बढ़ावा देने
की बात करती
है, तो वहीं
देश का दूसरा
पक्ष कुछ और
ही बयान करता
है। आज भी
ग्रामीण क्षेत्रों में शहरों
की अपेक्षा मृत्यु
दर ज्यादा है।
एक आकड़े के
मुताबिक आजादी के इतने
वर्षों के बाद
भी इलाज के
आभाव में प्रसव
काल में 1000 मे
110 महिलाएं दम तोड़
देती है। विश्व
स्वास्थ्य संगठन की मानें
तो प्रसव के
समय दम तोडऩे
वाली महिलाओ में
99 प्रतिशत महिलाये विकाशसील देशों
से सम्बंधित रखती
है। जबकि प्राय:
उन्हें बचाया जा सकता
है। इतना ही
नहीं जनसंख्या वृद्धि
को रोकने हेतु
भारत सरकार की
नियत भी सवालों
के घेरे में
है, क्योंकि सरकार
ने आशा और
आंगनबाडी की कर्मचारियों
पर जो आज
भी 1000-1500 रुपये मासिक वेतन
के लिए भटकते
हैं, उन्ही पर
परिवार कल्याण योजनाओं की
जिम्मेदारी सौपी है।
जन्म दर को
कम करके जनसंख्या
वृद्धि में कटौती
करने को ही
आम तौर पर
जनसंख्या नियंत्रण माना जाता
है। परन्तु प्रश्न
यह है कि
इस देश की
इतनी बड़ी जनसंख्या
वृद्धि की समस्या
की जिम्मेदारी किस
पर छोड़ी जाये।
इस पर सरकार
के पास कोई
ठोस नीति नहीं
है, एवं उनमें
जनसंख्या रोकने की दृढ़
इच्छाशक्ति भी दिखती।
संसद में देशहित
को ध्यान में
रखते हुए इस
समस्या को लेकर
बहस होनी चाहिए
लेकिन सब मौन
है। हमारी सरकार
पांच सितारा होटलों
में एक दूसरे
की पीठ थपथपा
कर अपनी जिम्मेदारी
से मुक्त होना
चाहती है। जबकि
जनसंख्या विस्फोट की चर्चा
ग्रामीण एवं अशिक्षित
समाज के बीच
होनी चाहिए। इतना
ही नहीं नौकरशाहों
के सुझावों पर
सरकार को गंभीरता
से सोचना चाहिए।
यदि हर मिनट
इतने बच्चे पैदा
हो रहे हैं
तो जरा सोचिये,
हर दिन कितने
बच्चे पैदा होते
होंगे। हम जनसंख्या
तो बढ़ा रहे
हैं लेकिन संसाधनों
को इस तरह
खत्म कर रहे
हैं कि हमारी
आने वाली पीढ़ी
के लिए संसाधनों
के खत्म होने
का डर लगातार
बढ़ता ही जा
रहा है। यह
कहना गलत न
होगा कि वह
दिन दूर नहीं
जब हम दाने-दाने के
लिये मोहताज हो
जायेंगे।
जनसंख्या में लगातार
वृद्धि होने में
लोगों की अज्ञानता
सबसे बड़ा कारण
रही। क्योंकि एक
तो इस क्षेत्र
में नियंत्रण के
साधन निकट या
सुलभ नहीं थे।
और दूसरा लोगों
में जन्म लेने
वाले बच्चे के
प्रति यह भाव
भी रहता था
कि जितने लडक़े-बच्चे होंगे, परिवार
में उतनी आय
बढ़ेगी। कृषि प्रधान
भारत के समाज
में बहू को 'दूधो नहाओ, पूतो
फलो' का आशीर्वाद
प्रदान किया जाता
है। जिससे अब
स्थिति ये हो
गई है कि
सामान्य आदमी के
पास न तो
इतना दूध है
कि पूत को
पिलाया जा सके
औरदूध से नहलाने
का तो कोई
सोच भी कैसे
सकता है। पढ़ी-लिखी लड़कियां
विवाह के उपरांत
अमूमन दो ही
बच्चों तक अपना
परिवार सीमित रखना चाहती
हैं। लेकिन जो
पढ़ी-लिखी नहीं
होती है। उनके
यहां अब भी
बच्चों की संख्या
पांच-सात तक
पहुंच जाती है।
अब जनसंख्या विस्फोट
इतना जबर्दस्त है
कि अधिक अनाज
के उत्पादन के
लिए रसायनिक पदार्थों
का प्रयोग बेरोक-टोक फल-फूल रहा
है। एक रसायनिक
इंजेक्शन से 1 किलो
की लौकी को
2 किलो का बनाने
के बाद भी
इंसानों का पेट
नहीं भर पा
रहा है।
सत्य तो ये
है कि जनसंख्या
नियंत्रण के मामले
में हमारी स्थिती
संतोषजनक नहीं है।
अब चाहें विश्व
में भारत पहला
ऐसा देश भले
ही हो जिसने
1952 में राष्ट्रीय परिवार कल्याण
नियंत्रण कार्यक्रम की शुरूआत
की थी। लेकिन
हमारे लिए समस्या
जस की तस
है। जनसंख्या और
परिवार नियोजन को समझना
एक बडी चुनौती
है। इस पर
हम सभी को
चिन्तन करना चाहिए।
पर्यावरण पर बढ़ते
आबादी के बोझ
के कारण प्राकृतिक
आपदाएं और समस्याएं
दिनों-दिन बढ़
रही है। कहीं
मौसम खराब तो
कही खाने की
कमी, कहीं ज्यादा
बारिश, तो कहीं
सूखा। नकली सामान
बनाने और कालाबाजारी
करने के बाद
भी सभी के
जरुरतों को हम
पूरा नहीं कर
पा रहे हैं।
कहा जाए तो
इस कलियुग में
हम सभी विकास
की जेट पर
सवार हैं। इस
प्रतिकूल स्थिति में भी
जनसंख्या पर नियंत्रण
इंसान बिना किसी
दबाव के कर
सकता है। लेकिन
इसके लिए उसका
जागरुक और शिक्षित
होना जरुरी है।
लिहाजा सरकार का कर्तव्य
है कि वह
जनता की आधारभूत
जरुरतों को पूरा
करने में उसकी
मदद करे। ऐसा
करने से हो
सकता है कि
जनसंख्या वृद्घि में कमी
आये।