Friday, 12 December 2014

टुंडे का कबाब नहीं खाया तो क्या खाया जनाब ....


नॉनवेज के शौकीन अक्सर कहते सुने जाते हैं कि अगर टुंडे का कबाब नहीं खाया तो क्या खाया? मुगलई खाने वाले यदि हैदराबादी बिरयानी का गुणगान करते हैं तो लखनऊ के टुंडे कबाब को भी नहीं भूलते। लखनऊ के अलावा भी कुछ शहरों में टुंडे के कबाब मिल जाते हैं। जितना प्रसिद्ध ये कबाब है उतनी ही प्रसिद्ध हैं इससे जुड़ी कहानियां और इसके प्रति दीवानगी के किस्से हैं |
नवाबों की नगरी लखनऊ सिर्फ नजाकत और नफासत ही नहीं बल्कि अपने लजीज खाने की वजह से भी जानी जाती है। बात जब लजीज खाने की  हो और उसमें टुंडे कबाब का नाम ना लिया जाये तो कुछ बेईमानी सी बात होगी। दुनियाभर में मशहूर यहां का टुंडे कबाब की खासियत है कि यह मुंह में डालते ही घुल जाता है। इसकी रेसिपी ही कुछ ऐसी है। राजधानी के चौक में अकबरी गेट के पास एक गली में टुंडे कबाबी की दुकान आज भी लोगो को अपनी ओर खींचती है। तीसरी पीढ़ी के अबु बकर बताते हैं कि यहां उनके  पुरखे करीब 200 साल पहले भोपाल से आए थे। वे बताते हैं कि उनके नाना के वालिद हाजी मुराद अली भोपाल के नवाब के बावर्ची थे। जो खाने-पीने के बड़े शौकीन थे। ऐसे में जब उनका बुढ़ापा आया और मुंह में दांत नहीं रहे तो उन्‍हें गोश्त खाने में मुश्किल होने लगी। इस पर नवाब साहब ने कुछ नया बनाने की फरमाइश की। इसके बाद बावर्ची ने मांस को बारीक पीसकर अच्छे-अच्छे मसालों और पपीता डालकर ऐसा कबाब बनाया गया जो मुंह में रखते ही घुल गया। इसके बाद बूढ़े क्या, जवान नवाबों को भी गिलावट के कबाब का ऐसा चस्का लगा कि इन्हें अवध के शाही कबाब का दर्जा मिल गया।

साल 1905 में खुली हाजी मुराद अली की दुकान


चौक में अकबरी गेट से थोड़ा अंदर घुसते ही एक बड़ी सी परात में कोयले की धीमी-धीमी आंच में लजीज कबाब पकते नजर आते हैं। ऐसा लगता है कि मानो इसकी सौंधी सी खुशबू आपको खुद अपनी ओर खींच लेती है। साल 1905 में छोटी सी जगह पर खुली हाजी मुराद अली की दुकान देश-दुनिया में किसी पहचान की मोहताज नहीं है। इसे अब टुंडे कबाब के नाम से जाना जाता है। ये बात और है कि ये अपने कबाब बनाने का पुश्‍तैनी नुस्‍खा किसी को नहीं बताते हैं। इनकी यही खासियत इन्‍हें दूसरों से अलग करती है। आज के समय में अमीनाबाद, कपूरथला और सहारागंज में इनकी दुकान चल रही है।

तो इसलिए टुंडे कबाब कहना शुरू कर दिया                                                               


टुंडे शब्द का मतलब होता है लूला या जिसका हाथ कटा हो। अबू बकर कहते हैं कि यह नाम तब से मशहूर हुआ जब हाजी मुराद का हाथ पतंग उड़ाते समय टूट गया और उसे बाद में काटना पड़ा। ऐसे में जब मुराद इसी स्थिति में दुकान पर बैठते थे तो लोगों ने इसे टुंडे कबाब बोलना शुरू कर दिया। इसके बाद यह इसी नाम से पूरी दुनिया में मशहूर हो गया। 


 कबाब का सीक्रेट नुस्‍खा


 इसमें कई तरह की जड़ी-बूटियों के साथ 135 तरह के मसालों का इस्‍तेमाल होता है। सारे मसाले अलग दुकानों से लेते है ताकि पता नहीं चले कि कौन-कौन से मसाले लिए जाते हैं। सभी मसाले घर में ही पीसे और भूने जाते हैं। अबु बकर के मुताबिक, यही उनका ट्रेड सीक्रेट है। इसे आज तक किसी को नहीं बताया गया। इसके अलावा इसमें कच्‍चा पपीता, भुना बेसन, खुशबू( केवड़ा, लौंग का धुंआ) भी मिलाया जाता है। कबाब बनाने में पूरे दो से ढाई घंटे लगते हैं। इन कबाबों की खासियत को नीम हकीम भी मानते हैं क्‍योंकि यह पेट के लिए फायदेमंद होता है। इसके साथ पराठे भी खाए जाते है जो मैदा, दूध, बादाम, देसी घी और अंडा डालकर बनाया जाता है। 
लखनऊ मैं रहकर अगर आपने अभी तक टुंडे कबाब का लुफ्त नहीं उठाया तो कोई फायेदा नहीं है आपके लखनऊ आने का फिर चाहे आप बाकी कुछ भी खा लो आपको असली मज़ा नही मिलेगा क्यूंकि ...
जब तक  टुंडे का कबाब नहीं खाया तो क्या खाया जनाब .....!!


Tuesday, 12 August 2014

ज़िन्दगी जब मायूस होती है, तभी महसूस होती है.....!



फिल्म ' दी डर्टी पिक्चर ' देखी......... ज़िन्दगी जब मायूस होती है तभी महसूस होती है.....! यह इसी फिल्म का एक संवाद है जो उस लड़की के मन में आता है जो  बड़े  परदे पर चमकने के सपने लिए ग्लैमर की  दुनिया में आती है और हर तरह के समझौते करते हुए अपने आपको स्थापित भी कर लेती है पर चकाचौंध भरी इस दुनिया में शोषित होते हुए शिखर पर पहुँचती हैं सिल्क एक समय इतनी अकेली हो जाती है कि आत्महत्या कर लेती हैकुछ विचार, कुछ प्रश्न जो इस फिल्म को देखने के बाद मन में आये....!
 वे चेहरे जो सिनेमा के रुपहले परदे  की चमक बने रहते हैं उनके वास्तविक जीवन में ऐसा अँधेरा क्यों होता है ...? क्यों संबंधों के अर्थपूर्ण भाव जिन्हें हम आस्था, समर्पण और विश्वास कहते हैं शो बिजनेस से घिरे रहते हैं..... ? क्यों ग्लैमर  के आसमान में उड़ने वाले हर सितारे को रिश्तों की पवित्रता और जीवन की चेतना से समझौता करके ही आगे बढ़ना होता है ...? कोई विजयलक्ष्मी स्वयं सिल्क बनती है या फिर बनाई जाती है ....? कई फ़िल्मी चेहरों का जीवन साक्षी है कि प्रसिद्धि और सम्पन्नता के आकाश पर झिलमिलाने वाले सितारों की झोली में अकेलापन और अवसाद चाहते  हुए भी गिरता है | भीड़ में रहने और जीने के बावजूद भी सूनेपन की त्रासदी इनके जीवन का हिस्सा बन ही जाती है | ऐसा अकेलापन जो ये स्वयं नहीं चुनते , बस समय बदलते ही अपने आप एक सौगात की तरह इन्हें थमा दिया जाता  है | इसे विडम्बना ही कहा जा सकता है कभी अकेले रहने को तरस जाने वाले सितारों के जीवन में एक समय ऐसा भी आता है, जब कोई खोज खबर लेने वाला भी नहीं होता | यह भी उनके जीवन का एक संघर्ष ही होता है पर कभी इन्हें हेडलाइंस नहीं बनाया जाता , क्योंकि समाचार भी सफलता के ही बनते हैं सन्नाटे और अवसाद भरे जीवन को यहाँ कौन पूछता है ..? यह एक ऐसी  दुनिया  है जहाँ काम है तो सब कुछ  है | लेकिन जब काम नहीं होता तो कुछ नहीं होता | ना दोस्त, ना चाहने वाले, ना परिवार वाले, ना इंटरव्यू और ना ही सुर्खियाँ  | यहीं से शुरू होता है नाटकीयता भरी ज़िन्दगी से परदे का उठना और हकीकत की दुनिया से सामना करने का सिलसिला | ऐसे में मायावी दुनिया में नाम कमा चुके चेहरे के लिए यह स्वीकार करना बहुत दुखदायी होता है कि अब उन्हें खास नहीं आम इन्सान बनकर जीना है | चूँकि सफलता कि सीढियां चढ़ते हुए हर निजी और सामाजिक रिश्ते को निवेश की तरह लिया जाता है, ऐसे समय पर इनके पास कोई अपना कहने को भी नहीं होता

               स्टारडम का दुनिया  ही कुछ ऐसी है की यहाँ हमेशा दिखते रहना ज़रूरी है | परदे पर उपस्थिति बनी रहे इसके लिए भी लगातार संघर्ष करना होता है | सुर्ख़ियों में रहने के हर तरह के समझौते यहाँ मान्य हैं | हर हाल में अपनी छवि और स्थान को बचाए रखने का तनाव आतंक की तरह होता है | परिस्थितियां इतनी विकट हो जाती हैं कि लाखों लोगों के मन में घर बनाने वालों के मन की पीड़ा को साझा करने वाला भी कोई नहीं होतायही वे परिस्थितियाँ होती हैं जब कोई नींद की गोलियां खा लेता है, फांसी के फंदे पर लटक जाता है या फिर ऊंची ईमारत से छलांग लगा देता है | हम सबको परदे पर ज़िन्दगी के  कई अच्छे बुरे रंग दिखाने वाले सितारे जीवन के इस बेरंग दौर में खुद से ही हार जाते हैं | इसकी एक अहम् वजह यह है कि उनके पास एक आम इन्सान की तरह कोई भावनात्मक सपोर्ट सिस्टम नहीं होता | रिश्तों की वो बुनियाद इनके जीवन में कभी बनती ही नहीं जो बिखरती ज़िन्दगी को मजबूती से थाम ले |
पहले परदे पर दिखने के लिए संघर्ष और फिर दिखते रहने के लिए | शारीरिक और मानसिक दवाब इतना कि चमचमाती रौशनी के बीच भी मन में दर्दनाक अँधेराकभी कभी तो लगता है कि सफलता के शिखर पर विराजे हमारे फ़िल्मी सितारों में जाने कौन क्या कीमत चुका रहा है ..? कौन चुपचाप  टूट रहा है .... ? किसके  बाहर से चमकते जीवन के भीतर भयानक अँधेरा है ....?