Friday, 21 February 2014

सड़कों पर रहते है पर " आवारा " नहीं




आपने सड़को और रेल पटरियों पर घूमते और सोते बच्चो को  तो जरुर देखा होगा ,ये वो बच्चे है जो या तो बच्चपन मैं ही माता -पिता से अलग हो जाते है ,या फिर खुद ही घर से भाग कर आ जाते है ,आनाथ और बेसहारा  बच्चो का इस दुनिया मैं  कोई और नहीं होता ,अगर वे किसी के साथ बात कर सकते है खेल सकते है तो वो सिर्फ अपने जैसे दूसरे बच्चो के साथ। 
                 जी हां ! जिन बच्चो को हमारा समाज स्ट्रीट चाइल्ड कि संज्ञा देता है असल मैं वो भी हम और आप जैसे ही है ,फ़र्क़ बस इतना है कि उनके पास अपना कहने वाला कोई नहीं है । देखने मैं तो ये बच्चे खुश लगते है लेकिन जैसे जैसे हमारा ज़मीनी हकीकत से सामना होता है तब  समझ मैं आता है कि उनके चेहरे कि ख़ुशी के पीछे एक गहरा दर्द छिपा होता है  । पहले से ही अकेलेपन से जुज रहे इन बच्चो का शारीरिक और मानसिक दोनों ही तरह शोषण भी किया जाता है । सड़को पर रहने वाले बच्चे जहा दिन भर सूरज कि गर्मी  मैं रहते हैं वही रात का अँधेरा गुनाह कि रोशनी लेकर आता है ,यह बच्चे सोते हुए भी सुरक्षित नहीं रहते हैं ,रेल कि पटरियों  पर रहने वाले बच्चो को आप हमेशा सस्ते नशे मैं डूबा हुआ पाएंगे और यह शारीरिक शोषण के सबसे ज्यादा शिकार होते है ,कुछ ऐसा ही हाल बसो और रेल आदि मैं घूमने वाले बच्चो का होता है ।  
                  इस दुर्दशा के पीछे जितनी ज़िम्मेदार  माता-पिता कि  लापरवाही है  ,उतना ही  सरकार का ढुलमुल रवईया भी हैं ,कुछ अभिभावक  बच्चो कि सही देखभाल नहीं कर पाते जो करनी चाहिए  तो कुछ उन्हें भगवान  भरोसे ही छोड़ देते हैं ,कुछ बच्चे अछे भविष्य कि चाह  मैं घर से भाग जाते हैं  और बाद मैं उन्हें ऐसी ज़िन्दगी मिलती है ,जो इन्हे एक बुरे सपने कि याद दिल देता है । । । ।