Thursday, 16 April 2015

ये सेल्फी सेल्फी़ क्या है ... :-p

आजकल ‘सेल्फी’ शब्द लोगों की जुबान पर है। लोगों की दीवानगी ने ‘सेल्फी’ को ऑक्सफोर्ड ‘वर्ड ऑफ द ईयर-2013’ बना दिया। आज के युवा अपने आपको बाहर की दुनिया से जोड़ने की बजाय ज्यादा से ज्यादा समय सोशल नेटवर्किंग साइट- फेसबुक, ट्विटर, व्हॅट्सअप पर बिता रहे हैं। एक ‘क्लिक’ ने सब कुछ आसान बना दिया। स्मार्टफोन का बोलबाला है, इन-बिल्ट कैमरा है, इंटरनेट पैक सस्ते हैं, जो कि हर किसी की पहुंच में हैं। यही सब देखते हुए सोशल साइट्स ‘सेल्फी कल्चर’ को बढ़ावा दे रहे हैं। फोन या कैमरे से खुद की तस्वीरें खींचना और उन्हें सोशल साइट्स पर पोस्ट करना, एक ट्रेंड बन गया है। आम आदमी से लेकर सेलिब्रिटी तक ‘सेल्फी’ जैसे आदत में घुलता जा रहा है।
सोशल नेटवर्क साइट पर फोटो पोस्ट करना और फिर दोस्तों से लाइक पाना, इनाम पाने जैसा लगता है। यह स्वाभाविक है, जब हमें किसी काम के लिए इनाम मिलता है, हम वह काम बार-बार करते हैं। कुछ लोग इसी बात से संतुष्ट हो जाते हैं कि उनकी सेल्फी को लाइक्स मिले, जबकि बाकी इसी कोशिश में रहते हैं कि उन्हें ज्यादा से ज्यादा लाइक मिलें और इसी चाहत में वे अलग-अलग पोज में फोटो पोस्ट करते चले जाते हैं। ऐसा लगातार होते रहने से सोचने की क्षमता भी प्रभावित होती है। ऐसे लोग अपना आत्मविश्वास तो खोते ही हैं, अपने प्रति नकारात्मक सोच भी पैदा कर लेते हैं। जैसे कि अपने आप से या फिर अपने शरीर से असंतुष्ट। इन्हीं सब के चलते अमेरिकी साइकियाट्रिक ऐसोसिएशन की एक रिपोर्ट के अनुसार ‘सेल्फी’ को ‘आब्सेसिव कम्पलसिव डिजायर’ से जोड़ा गया है, जिसमें व्यक्ति अपनी तस्वीरें खींचना और शेयर करने का आदी हो जाता है।