Monday, 10 March 2014

वो बारिश कि सुहानी शाम



 देखों बारिश शुरू हो गयी ! बाहर  से आवाज़ आई , आवाज़ सूनते ही मैं बारिश का मज़ा लेने के लिये  बालकनी मैं पड़े उस झूले पर आ के बैठ गयी। कुछ देर तक बैठ कर बारिश को देखने के बाद ऐसा लगा के जैसे वो बारिश कि बूँदे , वो पेड़ो कि पत्ती , वो गीली मिट्टी और वह मौजूद सभी चीज़ों मैं कितनी  गहरी दोस्ती हैं। ऐसा लग रहा था जैसे सब बड़ी उत्साह से अपने दोस्त बारिश का इंतज़ार कर रहे थे , और  अब वो उसे अपने साथ पाकर बहुत खुश थे । बारिश जिस तरह जोर शोर से मन मैं अपने दोस्तों से मिलने कि ख़ुशी लिए आसमान से उतरी , उसके सभी दोस्त भी उससे मिलकर खिल उठे , कही चमचमाती बूंदे पत्तो पर  गिरी तो वी ख़ुशी से हरे हो गये , तो कही फूलों पर मुस्कुराहट आ गयी , जरा सी मिट्टी भी अपने दोस्त से मिल कर कितनी खुश थी उसकी खुशबू ही बता रही थी । लेकिन फिर अचानक थोड़ा सा ध्यान भटका और दिमाग़  मैं आया के  अरे ! फेब  के महीने मैं बारिश !! फिर कुछ देर सोचने के बाद समझ आया के क्या इस दोस्त का मन करता होगा अपने इन प्यारे दोस्तों से दूर जाने का ??

             मैं सोच ही रही थी इन प्यारे दोस्तों के बारे मैं के फिर अंदर से एक आवाज़ आयी , अंदर आ जाओ बारिश रुक गयी है ।  लेकिन उस दिन के बाद जब भी बारिश होते हुए देखती हूँ , तो ऐसा लगता है के आज भी कुछ ऐसे दोस्त जो अगस्त के पहले संडे को मनाये जाने वाले फ्रेंडशिप डे का इंतज़ार नहीं करते , बस बे मौसम ही आ कर  अपनी दोस्ती निभा जाते है। 

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