Thursday, 20 February 2014

''मजदूरी के दलदल मैं फसा बचपन "


       बचपन इंसान कि ज़िन्दगी का सबसे हसीन पल होता है ,ना किसी बात कि चिंता और ना ही कोई ज़िम्मेदारी । बस हर समय अपनी मस्ती मैं खोये रहना , खेलना - कूदना और पढ़ना । लेकिन सभी का बचपन ऐसा हो ये जरुरी नहीं है। बाल मजदूरी कि समस्या  से आप अच्छी तरह से वाकिफ होंगे , कोई भी ऐसा बच्चा जिसकी उम्र १४ साल से कम हो और वो जीविका के लिए काम करे बाल मजदूर कहलाता है । गरीबी , लाचारी और माता - पिता कि प्रताड़ना के चलते ये बच्चे बाल मजदूरी के इस दलदल मैं धसते चले जाते है । आज दुनिया भर मैं लगभग 215 मिलियन बच्चे है जिनकी उम्र 14  साल से कम है और इन बच्चो का समय स्कूल मैं कॉपी किताबो और दोस्तों के बीच नहीं बल्कि होटलो , घरों  मैं बर्तनो , झाड़ू -पोछे और औजारों के बीच बीतता है । बड़े शेहरो  के साथ साथ आपको  छोटे शेहरो मैं भी हर गली नुक्कड़ पर कई राजू ,मुन्नू ,छोटू मिल जाएंगे जो हालातों  के चलते बाल मजदूरी कि गिरफ्त मैं आ चुके है,ये बात सिर्फ बाल मजदूरी तक ही सीमित  नहीं है इसके साथ ही बच्चो को कई  घिन्नौने कृत्यो का भी सामना करना पड़ता है । जिनका बच्चो के मासूम मन पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है।
            कई एनजीओ समाज मैं फैली इस कुरीतियों को नष्ट करने का प्रयास कर रहा है और आज सरकार ने आठवीं तक कि शिक्षा को भी अनिवार्य और निशुल्क कर दिया है ,लेकिन लोगो कि गरीबी और  बेबसी के आगे ये योजना भी निष्फल साबित होती  दिखायी दे रही है ।  बच्चो के माता पिता सिर्फ इसी वजह से उन्हें स्कूल नहीं भेजते क्यूकि उनके स्कूल जाने से परिवार कि आमदनी कम हो जायेगी । माना जा रहा है के आज 60  मिलियन बच्चे बाल मजदूर क शिकार है ,अगर ये आंकड़ा सच है तब तोह सरकार को जल्द से जल्द अपनी आँखे खोलनी होगी ,लगातार बढ़ते ये आंकड़े हमारे भविष्या  का कलंक बन सकती है । भारत मैं बाल मजदूरी कि संख्या बढ़ने का कारण सिर्फ गरीबी है । यहाँ एक तरफ तो ऐसे बच्चो का समूह है  जो बड़े बड़े मेहेंगे होटलो मैं 56 भोग का मज़ा उठाते है ,और दूसरी तरफ ऐसे बच्चो का समूह है जो गरीब है अनाथ है जिन्हे पेट भर खाना भी नसीब नहीं होता । दुसरो के जूठनो के सहारे वे अपना जीवन बिताते है । बाल मजदूरी को जड़ से खत्म करने के लिए सबसे पहले हमे गरीबी को खत्म करना होगा । अगर हमे इनकी ज़िन्दगी को बदलना है तो सिर्फ सरकार कि ही नहीं आम जनता कि भी इसमे सहभागिता जरुरी है ।  अगर हर एक यव्क्ति  जो आर्थिक रूप से सक्षम हो अगर ऐसे एक बच्चे कि ज़िम्मेदारी लेने लगे तो यक़ीनन सारा समाज ही बदल जायेगा ।  
                    क्या आपको नहीं लगता के कोमल बच्चपन को इस तरह खत्म  होने से आप रोक सकते है ? देश के सुरक्षित भविष्य के लिए अब वक़्त  आ गया है के आपको ये ज़िम्मेदारी अब लेनी ही होगी । पर सबसे बड़ा सवाल ये है कि -
                क्या आप लेंगे ऐसे किसी मासूम कि ज़िम्मेदारी ?

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